विज्ञान के नियमों को चुनौती देते पृथ्वी के सबसे गहरे भूकंप: हैरान वैज्ञानिक, यूटा और व्योमिंग के नीचे हिली धरती
700°C से अधिक खौलते तापमान में अचानक कैसे चटक रही हैं चट्टानें? दशकों पुराने रहस्य पर नए शोध ने किया सनसनीखेज खुलासा

23 जून 2026, वर्ल्ड डेस्क: आम तौर पर माना जाता है कि भूकंप पृथ्वी की ऊपरी परत यानी क्रस्ट (Crust) के करीब आते हैं, जहां चट्टानें ठंडी और सख्त होने के कारण अचानक टूट जाती हैं। लेकिन अमेरिका के उत्तरी यूटा (Utah) और दक्षिण-पश्चिमी व्योमिंग (Wyoming) के नीचे आ रहे कुछ अजीबोगरीब गहरे भूकंपों ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। धरती की इतनी गहराई में भारी दबाव और अत्यधिक तापमान होता है, जहां पारंपरिक विज्ञान के अनुसार चट्टानों को टूटने के बजाय धीरे-धीरे पिघलना या मुड़ना चाहिए।
ताजा शोध बताते हैं कि ये अजीब झटके कोई मशीनी गड़बड़ी या मापने की गलती नहीं हैं, बल्कि ये सचमुच पृथ्वी के मेंटल (Mantle – क्रस्ट के नीचे की परत) में होने वाली वास्तविक हलचलें हैं।

1979 के रहस्य से जुड़े हैं तार
इस रहस्य की शुरुआत 24 फरवरी 1979 को हुई थी, जब रैंडोल्फ, यूटा के पास 3.8 तीव्रता का एक भूकंप दर्ज किया गया। डेटा के अनुसार, इस भूकंप का केंद्र समुद्र तल से करीब 94 किलोमीटर नीचे था। इतनी गहराई में महाद्वीपीय भूकंप आना लगभग असंभव माना जाता है, क्योंकि वहां का तापमान चट्टानों को लचीला बना देता है।
दशकों तक चली बहस के बाद, जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक नए अध्ययन (“अपर मेंटल अर्थक्वेक अलोंग द एज ऑफ द व्योमिंग क्रेटन”) में वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि 1979 की वह घटना कोई इकलौता अपवाद नहीं थी। साल 1979 से 2023 के बीच के डेटा की जांच करने पर शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में मेंटल के अंदर आने वाले कुल 9 पुख्ता भूकंपों की पहचान की है।

वैज्ञानिकों ने की 9 गहरे मेंटल भूकंपों की पुष्टि
शॉन जे. हचिंग्स के नेतृत्व में किए गए इस शोध में क्रस्ट की मोटाई के 14 अलग-अलग मॉडलों का इस्तेमाल किया गया। जांच में सामने आया कि ये सभी 9 भूकंप ‘मोहो’ (Moho – वह सीमा जो क्रस्ट और मेंटल को अलग करती है) के काफी नीचे आए थे।
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इनमें से 8 भूकंप इस सीमा से भी 15 किलोमीटर से ज्यादा गहराई पर थे।
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सबसे गहरा भूकंप (1979 वाला) मोहो सीमा से भी लगभग 60 किलोमीटर नीचे था।
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इन भूकंपों की तीव्रता छोटे झटकों से लेकर साल 2013 में व्योमिंग की विंड रिवर रेंज के नीचे आए 4.8 तीव्रता के भूकंप तक दर्ज की गई।
सितंबर 2025 में फिर दिखा ऐसा ही दुर्लभ नजारा
इस घटना ने तब और जोर पकड़ा जब पिछले साल 10 सितंबर 2025 को उत्तर-पूर्वी यूटा के मेसर (Maeser) इलाके में 4.1 तीव्रता का एक और गहरा भूकंप आया। द सिस्मिक रिकॉर्ड में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इस भूकंप की गहराई जमीन से लगभग 65 से 70 किलोमीटर नीचे आंकी गई, जबकि उस इलाके में पृथ्वी की ऊपरी परत (क्रस्ट) महज 40 से 45 किलोमीटर ही मोटी है।
वैज्ञानिकों ने इसे एक आदर्श “महाद्वीपीय मेंटल भूकंप” माना है। इस भूकंप की खास बात यह थी कि इसके पहले या बाद में कोई छोटे झटके (Foreshocks या Aftershocks) महसूस नहीं किए गए, और इसकी तरंगों में बहुत तेज हाई-फ्रीक्वेंसी एनर्जी देखी गई।
क्यों आ रहे हैं इस खास इलाके में भूकंप?
वैज्ञानिकों के अनुसार, ये सभी भूकंप ‘व्योमिंग क्रेटन’ (Wyoming Craton) के पश्चिमी किनारे से 100 किलोमीटर के दायरे में आ रहे हैं। क्रेटन महाद्वीप का वह प्राचीन और बेहद मजबूत हिस्सा होता है जो अरबों सालों से स्थिर है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि जब पृथ्वी के अंदरूनी मेंटल का पिघला हुआ पदार्थ इस ठोस और भारी क्रेटन के नीचे से धीरे-धीरे गुजरता है, तो इस किनारे पर भारी तनाव (Stress) पैदा होता है। मेंटल के इस बहाव के कारण पैदा होने वाला दबाव ही इतनी गहराई में भूकंप की वजह बन रहा है।
700°C से अधिक तापमान में कैसे टूट रही हैं चट्टानें?
अध्ययन के मुताबिक, इन 9 में से 8 भूकंप ऐसे क्षेत्रों में आए जहां का तापमान 700°C से लेकर 1000°C के बीच है। इतने खौलते तापमान में चट्टानों का अचानक चटकना नामुमकिन सा है। इसे समझाने के लिए वैज्ञानिकों ने दो थ्योरी दी हैं:
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थर्मल रनअवे (Thermal Runaway): इसमें एक बहुत ही संकरे हिस्से में अचानक ऊर्जा और घर्षण इतना बढ़ जाता है कि आसपास का हिस्सा लचीला होने के बावजूद वहां अचानक ऊर्जा का विस्फोट (भूकंप) हो जाता है।
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मेंटल फ्लूइड्स: वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि मेंटल की गहराई में मौजूद कुछ तरल पदार्थ (Fluids) भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभा सकते हैं, हालांकि इसकी सटीक वजह जानने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है।




