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महासागर की गहराइयों में वैज्ञानिकों को मिली ‘प्राकृतिक ब्रेक’, बड़े विनाशकारी भूकंपों को रोकने में है सक्षम

समुद्री फॉल्ट के रहस्यों से उठा पर्दा: 'गोफर ट्रांसफॉर्म फॉल्ट' में छिपी बाधाएं भूकंप की तीव्रता को कम करने में निभा रही हैं महत्वपूर्ण भूमिका

डिजिटल डेस्क: प्रशांत महासागर की गहराइयों में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी अद्भुत खोज की है, जिसे ‘प्रकृति का अपना ब्रेक’ (nature’s own brakes) कहा जा रहा है। यह खोज सदियों से भूकंप वैज्ञानिकों के लिए पहेली बने एक समुद्री फॉल्ट के रहस्यों को सुलझाने में मदद कर सकती है।

क्या है यह ‘ब्रेक’ जोन?

इक्वाडोर के तट से लगभग 1,000 मील पश्चिम में स्थित गोफर ट्रांसफॉर्म फॉल्ट (Gofar transform fault) पर दशकों से शोध चल रहा था। यहाँ का पैटर्न हैरान करने वाला था—हर 5 से 6 साल में यहाँ लगभग समान तीव्रता के भूकंप आते थे और फिर रुक जाते थे।

इंडियाना यूनिवर्सिटी ब्लूमिंगटन के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हुए नए अध्ययन से पता चला है कि इस फॉल्ट के अंदर ‘हिडन ब्रेक जोन’ मौजूद हैं। ये प्राकृतिक बाधाएं भूकंपीय झटकों को तब तक धीमा कर देती हैं, जब तक कि वे किसी बहुत बड़े और विनाशकारी ‘मेगाक्वेक’ का रूप न ले लें।

कैसे काम करती है यह प्रक्रिया?

वैज्ञानिकों ने समुद्र की सतह पर विशेष भूकंपमापी उपकरण तैनात किए। उन्होंने पाया कि:

  • फ्रैक्चर और रिसाव: ये ब्रेक जोन सामान्य चट्टानें नहीं हैं, बल्कि ये अत्यधिक खंडित और जटिल हिस्से हैं जहाँ फॉल्ट कई छोटी धाराओं में बँटा हुआ है। इनमें समुद्र का पानी गहराई तक रिसता रहता है।

  • डाइलेटेंसी स्ट्रेंथनिंग (Dilatancy Strengthening): भूकंप के दौरान, इन तरल पदार्थों से भरी चट्टानों में दबाव अचानक कम हो जाता है। दबाव कम होते ही आसपास की छिद्रपूर्ण चट्टानें अस्थायी रूप से कठोर और ‘लॉक’ हो जाती हैं। यही प्रक्रिया भूकंपीय ऊर्जा को आगे बढ़ने से रोक देती है।

भविष्य के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

मुख्य शोधकर्ता जियानहुआ गोंग के अनुसार, ये बाधाएं निष्क्रिय नहीं हैं, बल्कि फॉल्ट सिस्टम का सक्रिय हिस्सा हैं। इस खोज से वैज्ञानिकों को दुनिया भर के समुद्री भूकंपों को बेहतर ढंग से समझने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को सटीक बनाने और तटीय समुदायों के लिए आपदा प्रबंधन रणनीतियों को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

यह खोज न केवल समुद्री विज्ञान में एक मील का पत्थर है, बल्कि यह भविष्य में संभावित बड़ी आपदाओं से बचाव की दिशा में एक नई उम्मीद भी जगाती है।

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