क्यों पिघल जाती हैं यूके की सड़कें, जबकि भारत में 45°C तापमान में भी रहती हैं सुरक्षित?
क्वालिटी नहीं, इंजीनियरिंग का खेल: जानें कैसे दोनों देशों की जलवायु के हिसाब से अलग-अलग तरीके से बनाई जाती हैं सड़कें

नई दिल्ली: यूरोप में हाल ही में पड़ी भीषण गर्मी ने कई देशों को झकझोर कर रख दिया है। ब्रिटेन (UK) में तापमान के 40°C तक पहुँचने के बाद ऐसी खबरें सामने आईं कि वहां सड़कें पिघल रही हैं और वाहनों के टायर उनमें धंस रहे हैं। यह स्थिति भारत के लोगों के लिए एक पहेली जैसी है, जहां तापमान अक्सर 45°C से 48°C तक चला जाता है, फिर भी हमारी सड़कें इस तरह नहीं पिघलतीं। क्या भारतीय सड़कें बेहतर गुणवत्ता की हैं? आइए, इस तकनीकी अंतर को विस्तार से समझते हैं।
1. सड़कों के निर्माण में ‘डामर’ (Bitumen) का विज्ञान
सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाला मुख्य पदार्थ ‘बिटुमेन’ या डामर है। यह कच्चे तेल से प्राप्त एक चिपचिपा हाइड्रोकार्बन है जो पत्थरों (एग्रीगेट्स) को आपस में बांधकर रखता है।
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यूके की चुनौती (ठंड और लचीलापन): ब्रिटेन में साल का बड़ा हिस्सा ठंड और बर्फीली स्थितियों में बीतता है। यदि वहां की सड़कों में बहुत सख्त बिटुमेन का उपयोग किया जाए, तो अत्यधिक ठंड में वे कठोर होकर कांच की तरह चटक (Crack) सकती हैं। इसलिए, वहां की सड़कों को ‘हॉट रोल्ड डामर’ (HRA) से बनाया जाता है, जिसमें नरम बिटुमेन का उपयोग होता है ताकि वे कम तापमान में भी लचीली बनी रहें।
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भारत की स्थिति (भीषण गर्मी): भारत में साल भर तेज धूप और भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है। यहाँ की सड़कों को पिघलने से बचाने के लिए VG-30 और VG-40 ग्रेड के बिटुमेन का उपयोग किया जाता है। VG का अर्थ है ‘Viscosity Grade’ (श्यानता ग्रेड)। नंबर जितना अधिक होता है, बिटुमेन उतना ही अधिक गाढ़ा और गर्मी के प्रति प्रतिरोधी होता है।
2. इंजीनियरिंग का चुनाव: लचीलापन बनाम मजबूती
यह गुणवत्ता की बात नहीं, बल्कि ‘इंजीनियरिंग चयन’ की बात है।
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यूके में लचीलापन (Flexibility): ब्रिटेन में सड़क इंजीनियरों का मुख्य लक्ष्य ऐसी सतह बनाना होता है जो सर्दियों में फैल और सिकुड़ सके। जब अचानक गर्मी बढ़ती है, तो वही नरम बिटुमेन बहुत जल्दी गर्म होकर चिपचिपा हो जाता है, जिससे सतह ‘नरम’ महसूस होने लगती है।
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भारत में मजबूती (Heat Resistance): भारतीय सड़कों का निर्माण उच्च तापमान पर उनके आकार को स्थिर रखने के लिए किया जाता है। यहाँ हम बड़े आकार के एग्रीगेट्स (पत्थरों) का उपयोग करते हैं जो भारी वाहनों के दबाव में भी सड़क की सतह को एक निश्चित कठोरता प्रदान करते हैं।
3. जलवायु के अनुरूप अनुकूलन
यह एक सामान्य इंजीनियरिंग नियम है कि किसी भी बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का निर्माण उस क्षेत्र की ‘सामान्य’ जलवायु के आधार पर किया जाता है, न कि ‘अत्यधिक दुर्लभ’ चरम घटनाओं के आधार पर।
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ब्रिटेन के लिए 40°C तापमान एक दुर्लभ और चरम घटना (Extreme event) है, जिसके लिए वहां का ढांचा डिजाइन नहीं किया गया है।
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भारत के लिए 40°C से 45°C तापमान एक ‘सामान्य’ बात है, इसलिए हमारे निर्माण मानक (Standards) पहले से ही इसे ध्यान में रखकर तय किए गए हैं।
निष्कर्ष
तो, क्या यूके की सड़कें खराब हैं? बिल्कुल नहीं! वे अपनी जलवायु के अनुसार बिल्कुल सही हैं। अंतर केवल इतना है कि ‘ब्रिटिश सड़कें सर्दियों के लिए बनी हैं’ और ‘भारतीय सड़कें गर्मियों के लिए’। अगर हम भारत की तरह की सड़कें ब्रिटेन में बनाएंगे, तो वे शायद भीषण सर्दियों में चटककर बिखर जाएंगी।




