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महिला आरक्षण बिल बेअसर? राजनीतिक दलों की ‘टिकट कंजूसी’ से हताश उम्मीदें

चुनावों में महिलाओं को मिले महज 10 फीसदी टिकट, बिना कानूनी मजबूरी के दलों का नजरिया जस का तस

ब्यूरो: संसद से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण बिल) पास होने के बाद देश में यह उम्मीद जगी थी कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी। हालाँकि, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की हालिया रिपोर्ट ने इन दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, बिल पास होने के बाद भी राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को टिकट देने में भारी कंजूसी बरती जा रही है।

प्रमुख आँकड़े और निष्कर्ष

ADR ने महिला आरक्षण बिल के पारित होने के बाद हुए लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में कुल 51,708 उम्मीदवारों के डेटा का गहन विश्लेषण किया है। निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले हैं:

  • मात्र 10% टिकट: इन 51,708 उम्मीदवारों में से केवल 5,095 महिलाएँ थीं, जो कुल संख्या का मात्र 10% है।

  • लोकसभा चुनाव 2024 की स्थिति: 2024 के लोकसभा चुनावों में कुल 8,360 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें से केवल 800 महिलाएँ थीं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि देश के 543 संसदीय क्षेत्रों में से 152 सीटों पर एक भी महिला उम्मीदवार नहीं थी।

  • वर्तमान प्रतिनिधित्व: इन आंकड़ों के चलते, 18वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या केवल 74 है, जो कुल सदन का मात्र 14% है।

राजनीतिक दलों का रवैया

ADR रिपोर्ट ने राजनीतिक दलों के नारी शक्ति के दावों और उनके जमीनी प्रदर्शन के बीच के अंतर को उजागर किया है:

राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने की दर
भारतीय जनता पार्टी (BJP) 16%
कांग्रेस 13%
माकपा (CPI-M) 13%
बहुजन समाज पार्टी (BSP) 8%
आम आदमी पार्टी (AAP) 0% (विश्लेषण में शामिल 22 उम्मीदवारों में से कोई नहीं)

विधानसभा चुनावों में भी सुस्त रफ्तार

विधानसभा चुनावों की तस्वीर भी कुछ अलग नहीं है। बिल पास होने के बाद 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुए चुनावों में कुल 31,429 उम्मीदवार थे, जिनमें से केवल 3,273 (10.2%) महिलाएँ थीं। किसी भी राज्य में महिला उम्मीदवारों की भागीदारी 14% से अधिक नहीं रही है।

कानून लागू होने में अभी और देरी?

देश की लगभग 49% आबादी महिलाएँ हैं और मतदाताओं की संख्या 66.29 करोड़ है, इसके बावजूद राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भारत काफी पीछे है। 1 मार्च 2025 की आईपीयू (IPU) रैंकिंग के अनुसार, संसद में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत दुनिया के 185 देशों में 151वें स्थान पर है।

आगे की राह: यद्यपि महिला आरक्षण कानून पारित हो चुका है, लेकिन यह अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) के बाद ही प्रभावी होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2026-27 में प्रस्तावित जनगणना समय पर पूरी होती है, तभी 2029 के अगले लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33% सीटों का उनका वास्तविक हक मिल पाएगा।


इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि जब तक कानूनी रूप से सीटों का आरक्षण अनिवार्य नहीं हो जाता, तब तक राजनीतिक दल स्वयं की इच्छाशक्ति से महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के लिए तैयार नहीं दिखते।

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