
13 जुलाई, 2026, चंडीगढ़, पंजाब
रिपोर्ट: विशेष संवाददाता: पंजाब के इतिहास में 1980 और 90 के दशक का समय न केवल राजनीतिक उथल-पुथल और मानवीय त्रासदियों का काल था, बल्कि यह एक ऐसी क्रूरता का भी गवाह रहा जिसे अक्सर इतिहास के पन्नों में नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह कहानी उन हज़ारों बेजुबान कुत्तों की है, जिन्हें आतंकवाद के दौर में अपनी जान गंवानी पड़ी।
कुत्तों को क्यों बनाया गया निशाना?
उस दौर में खालिस्तानी आतंकवादियों का फरमान था कि गांवों में पालतू कुत्तों को खत्म कर दिया जाए। आतंकवादियों का मानना था कि रात के अंधेरे में जब वे किसी गांव से गुजरते थे या छिपते थे, तो कुत्तों के भौंकने से उनकी मौजूदगी का पता चल जाता था और सुरक्षा बल सतर्क हो जाते थे। उग्रवादियों ने इन मूक प्राणियों को ‘सुरक्षा बलों के मुखबिर’ के रूप में देखना शुरू कर दिया।
एक दर्दनाक विकल्प
वरयाम सिंह संधू की प्रसिद्ध कहानी ‘चौथी कूट’ और उस दौर की जमीनी हकीकत बताती है कि कैसे दहशत का माहौल था। गांव वालों को यह स्पष्ट आदेश दिया गया था कि या तो वे अपने पालतू कुत्तों को मार दें, या फिर उन कुत्तों के भौंकने पर होने वाले ‘परिणाम’ भुगतने के लिए तैयार रहें।
वरयाम सिंह संधू ने एक साक्षात्कार में अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया था कि कैसे उनके भाई के परिवार को अपने प्यारे पालतू कुत्तों को खुद ही जहर देकर मारना पड़ा था। आतंकवादियों ने परिवार को साइनाइड कैप्सूल दिए थे, जिन्हें दही में मिलाकर कुत्तों को खिलाने का क्रूर फरमान सुनाया गया था। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं थी, बल्कि पूरे पंजाब के गांवों का यही हाल था।

खौफ का वो दौर
उस समय पंजाब में सिर्फ कुत्ते ही नहीं, बल्कि आम जनजीवन भी बुरी तरह प्रभावित था। संगीत, नृत्य और उत्सवों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था। लोक गायक अमर सिंह चमकीला और उनकी पत्नी अमरजोत की दिनदहाड़े हत्या के बाद पूरा संगीत जगत खामोश हो गया था।
वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने 1991 में ‘इंडिया टुडे’ के लिए अपनी रिपोर्ट ‘द रूल ऑफ द गन’ में इस दहशत को बखूबी बयां किया था। उन्होंने लिखा था कि सूर्यास्त के बाद सन्नाटा पसर जाता था और लोग अपने घरों में दुबक जाते थे। अगर उग्रवादियों की बंदूकें गलियों में चलती थीं और किसी कुत्ते के मुंह से एक भी आवाज निकलती थी, तो उसके मालिक की जान पर बन आती थी।
निष्कर्ष
आज के दौर में जब हम उस कालखंड को याद करते हैं, तो इंसानी नुकसानों की चर्चा तो होती है, लेकिन उन हज़ारों बेजुबानों की बलि को भुला दिया जाता है। वे न तो आतंकवादियों के पक्ष में थे और न ही पुलिस के, वे केवल अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति (भौंकने) का पालन कर रहे थे। पंजाब के उस दौर का यह ‘डॉग किलिंग’ अध्याय मानवीय क्रूरता की एक ऐसी मिसाल है जो आज भी किसी को भी झकझोर कर रख देने के लिए काफी है।
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इस रिपोर्ट के लिए मुख्य जानकारी निम्नलिखित स्रोतों से ली गई है:
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वरयाम सिंह संधू की कहानी: ‘चौथी कूट’ (जो उस दौर के भयावह हालातों और मानवीय त्रासदी का एक प्रामाणिक चित्रण है)।
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मीडिया रिपोर्ट: वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता द्वारा 1991 में ‘इंडिया टुडे’ के लिए लिखी गई रिपोर्ट: ‘द रूल ऑफ द गन’ (The Rule of the Gun)।
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ऐतिहासिक संदर्भ: 1980 और 90 के दशक के पंजाब का काला दौर और उस समय की जमीनी हकीकतें
- Disclaimer: यह लेख इंडिया टुडे (India Today) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट पर आधारित है




