लेह, 29 जून: लद्दाख के संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों में अवैध ऑफ-रोडिंग करने के मामले में पहली बार बड़ी कार्रवाई करते हुए प्रशासन ने चार पर्यटकों पर कुल 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश और चंडीगढ़ के इन वाहन मालिकों से वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत प्रति व्यक्ति 50,000 रुपये वसूले गए। सभी वाहनों को मौके पर ही जब्त कर लिया गया था और रविवार को जुर्माना भरने के बाद ही उन्हें छोड़ा गया।
कैसे पकड़े गए मामले
पिछले पखवाड़े में हुई ये चारों घटनाएं नियमित गश्त और सोशल मीडिया निगरानी के जरिए सामने आईं। कई वीडियो वायरल होने के बाद वन विभाग हरकत में आया।
क्या-क्या हुआ
17 जून: हिमाचल नंबर की टोयोटा फॉर्च्यूनर का वीडियो सामने आया जिसमें चांगथांग कोल्ड डेज़र्ट वाइल्डलाइफ सेंचुरी के नूरबू ला इलाके में तिब्बती गज़ेल का पीछा किया जा रहा था। अगले ही दिन हानले के एक होमस्टे के पास से गाड़ी को ट्रैक कर जब्त कर लिया गया।
20 जून: काराकोरम (नुब्रा-श्योक) वाइल्डलाइफ सेंचुरी में एक महिंद्रा थार को नाले के बीच से चलाते हुए फिल्माया गया, जिससे वहां के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचा।
21 जून: पैंगोंग झील के किनारे एक हुंडई क्रेटा ऑफ-रोडिंग करती पकड़ी गई।
23 जून: स्टंट के लिए दूसरी महिंद्रा थार को मेराक के पास सीधे पैंगोंग झील के पानी में उतार दिया गया। अधिकारियों के मुताबिक इससे झील में प्रदूषण फैला और वहां का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हुआ।
लद्दाख के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना ने इन घटनाओं की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि लद्दाख देश-विदेश के सभी पर्यटकों के लिए खुला है, लेकिन संरक्षित क्षेत्रों में इस तरह का व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने पर्यटकों और वाहन मालिकों से अपील की कि वे वन्यजीवों के आवास में न जाएं, लुप्तप्राय प्रजातियों को परेशान न करें और पहले से ही जलवायु तनाव झेल रहे ऊंचाई वाले पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान न पहुंचाएं।
सरकार के प्रवक्ता ने पुष्टि की है कि झीलों, नालों और अभयारण्यों में अवैध ऑफ-रोडिंग के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। प्रशासन इसे एक बढ़ती समस्या मान रहा है।
लद्दाख के ऊंचाई वाले अभयारण्य देश के सबसे दुर्लभ वन्यजीवों का घर हैं। अकेले चांगथांग कोल्ड डेज़र्ट वाइल्डलाइफ सेंचुरी में तिब्बती गज़ेल, हिम तेंदुआ और कियांग जैसी प्रजातियां रहती हैं। 4,300 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित पैंगोंग झील का पारिस्थितिकी तंत्र बेहद नाजुक है और भौतिक छेड़छाड़ से उबरने में सालों लग जाते हैं।
- तिब्बती गज़ेल, जिसे ‘गोआ’ भी कहा जाता है, ‘नियर थ्रेटेंड’ श्रेणी में आती है। अभयारण्य क्षेत्रों में वाहनों से वन्यजीवों का पीछा करने से उन्हें जानलेवा तनाव हो सकता है, प्रजनन व्यवहार बाधित होता है और पूरे इलाके का आवास खराब हो जाता है।




