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प्रशासन बेसुध, तो ग्रामीणों ने खुद ही थाम ली कमान: चकराता में जीती मेहनत और हौसले की जंग

सरकारी वादों से थककर ग्रामीणों ने चंदा और श्रमदान से खड़ा किया नदी पर पुल, व्यवस्था पर खड़े किए बड़े सवाल

14 जुलाई, चकराता (उत्तराखंड): विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच, उत्तराखंड के चकराता स्थित छाजाद खेड़ा नखरी गाँव की एक तस्वीर व्यवस्था की पोल खोल रही है। जहाँ सरकारी तंत्र विफल रहा, वहाँ ग्रामीणों ने अपने हौसले और आपसी सहयोग से अपनी तकदीर खुद लिखने का फैसला किया।

क्या है पूरा मामला?

पिछले कई वर्षों से इस गाँव के निवासी प्रशासन से एक पक्के पुल की गुहार लगा रहे थे। हर मानसून में जब नदी का जलस्तर बढ़ता है, तो रास्ता बंद हो जाता है। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूल जाने वाले बच्चों को होती है, जिन्हें जान जोखिम में डालकर उफनती नदी को पार करना पड़ता है। कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई गई, लेकिन आश्वासन के सिवाय ग्रामीणों को कुछ नहीं मिला।

आत्मनिर्भरता की मिसाल

जब सरकार से मदद की उम्मीद खत्म हो गई, तो गाँव के युवाओं और बुजुर्गों ने खुद ही समस्या का समाधान निकालने की ठानी। ग्रामीणों ने बिना किसी इंजीनियर या सरकारी बजट के, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध लकड़ी के लट्ठों और पत्थरों का उपयोग कर एक अस्थायी पुल खड़ा कर दिया। यह पुल महज लकड़ी का ढांचा नहीं, बल्कि उन लोगों के दृढ़ संकल्प का प्रतीक है जो अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी प्रशासन की राह नहीं देख सकते।

विकास पर बड़े सवाल

यह घटना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि दूरदराज के गाँवों में आज भी विकास की मुख्यधारा कितनी दूर है। ग्रामीणों द्वारा बनाया गया यह पुल भले ही अस्थायी है, लेकिन यह शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कब तक ग्रामीणों को अपनी जान हथेली पर रखकर पुल बनाना पड़ेगा?

स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे कब तक अपनी जान जोखिम में डालेंगे? अब देखना यह है कि क्या इस घटना के बाद प्रशासन की नींद खुलती है या ये ग्रामीण भविष्य में भी इसी तरह खुद संघर्ष करते रहेंगे।


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