दिल्ली पर महाभूकंप का साया: विशेषज्ञों ने कहा- मध्यम झटका भी नहीं झेल पाएंगी अधिकांश इमारतें
हिमालय के करीब होने से बढ़ा जोखिम; स्ट्रक्चरल इंजीनियरों ने अवैध और अनियोजित निर्माण को बताया टाइम बम

नई दिल्ली: वेनेजुएला में हाल ही में आए विनाशकारी भूकंप और उसके बाद महसूस किए गए तबाही के मंजर ने अब भारत के महानगरों, विशेषकर देश की राजधानी दिल्ली की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के कई हिस्सों में लगातार हल्के और मध्यम तीव्रता के भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं, जिससे जान-माल का नुकसान भी हुआ है। दिल्ली-एनसीआर में भी लगातार आने वाले छोटे-मोटे झटके किसी बड़े खतरे की आहट माने जा रहे हैं। भूवैज्ञानिकों और संरचनात्मक इंजीनियरों (Structural Engineers) की ताजा चेतावनियों ने इस डर को और गहरा कर दिया है।

सिस्मिक ज़ोन 4 में है दिल्ली: खतरा बेहद करीब
भौगोलिक और भूगर्भीय संरचना के दृष्टिकोण से भारत का लगभग 59 प्रतिशत हिस्सा भूकंपीय क्षेत्रों (Earthquake-Prone Zones) में आता है। वैज्ञानिकों ने देश को सिस्मिक ज़ोन 1 से ज़ोन 5 तक विभाजित किया है, जिसमें ज़ोन 5 को सबसे खतरनाक माना जाता है।

इस वर्गीकरण के तहत दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) को सिस्मिक ज़ोन 4 (Seismic Zone 4) में रखा गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि दिल्ली में भूकंप का जोखिम मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे ज़ोन 3 वाले शहरों की तुलना में कहीं अधिक है। दिल्ली की हिमालय से निकटता इसे और अधिक संवेदनशील बनाती है, क्योंकि हिमालयी क्षेत्र टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से बना है और वहाँ जमीन के नीचे लगातार हलचल जारी रहती है।

80% इमारतें मानकों पर नहीं उतरतीं खरी: विशेषज्ञ की चेतावनी
भारतीय संरचनात्मक इंजीनियर संघ (Indian Association of Structural Engineers) के पूर्व प्रमुख, प्रोफेसर महेश टंडन के अनुसार, दिल्ली का खतरा केवल प्राकृतिक नहीं है, बल्कि मानव-निर्मित भी है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि दिल्ली की लगभग 70 से 80 प्रतिशत इमारतें ऐसी हैं जो किसी मध्यम दर्जे के भूकंप के झटके को भी झेलने में सक्षम नहीं हैं।
विशेष रूप से यमुना नदी के पूर्वी और पश्चिमी किनारों (जैसे पूर्वी दिल्ली और उससे सटे इलाके) पर पिछले कुछ दशकों में जो अंधाधुंध निर्माण हुआ है, वह सबसे बड़े खतरे की कगार पर है। प्रो. टंडन ने बताया कि इनमें से अधिकांश बहुमंजिला और आवासीय इमारतों के निर्माण से पहले बुनियादी सॉइल टेस्टिंग (Soil Testing यानि मिट्टी की जांच) तक नहीं की गई है, जो कि किसी भी सुरक्षित इमारत की नींव के लिए अनिवार्य होती है।
क्यों बढ़ जाती है चिंता?
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अवैध और अनियोजित निर्माण: दिल्ली के कई घनी आबादी वाले इलाकों में बिना किसी आर्किटेक्चरल गाइडलाइन या भूकंपरोधी (Earthquake-resistant) तकनीक के बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी गई हैं।
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कमजोर नींव और खराब सामग्री: पुरानी इमारतों के रख-रखाव में कमी और निर्माण के दौरान घटिया सामग्री का उपयोग जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
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राहत कार्य में बाधा: यदि दिल्ली में कोई बड़ा भूकंप आता है, तो यहाँ की तंग गलियों और आपस में सटी इमारतों के कारण राहत और बचाव कार्य (Rescue Operations) चलाना भी बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
समय रहते कदम उठाना जरूरी
वेनेजुएला में आए भूकंप के बाद विशेषज्ञों का साफ कहना है कि दिल्ली को इस चेतावनी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। प्रशासन और आम नागरिकों को मिलकर इमारतों का ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट’ (Structural Audit) कराना चाहिए और पुरानी व कमजोर इमारतों को मजबूत (Retrofitting) करने की दिशा में तुरंत कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में होने वाली किसी भी बड़ी मानवीय त्रासदी से बचा जा सके।




