
20 जुलाई, नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने हाल ही में संसद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा की जा रही पुरातात्विक गतिविधियों का ब्यौरा साझा किया है। केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से बताया कि वर्तमान में भारत के विभिन्न हिस्सों में कुल 16 पुरातात्विक खुदाई (excavation) परियोजनाएं सक्रिय रूप से चल रही हैं।
खुदाई परियोजनाओं का ब्यौरा और खर्च
मंत्री द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि इन 16 सक्रिय स्थलों पर अब तक लगभग 6.8 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है। परियोजनाओं की लागत में राखीगढ़ी सबसे ऊपर है:
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राखीगढ़ी (हरियाणा): 2.16 करोड़ रुपये (सबसे महंगी परियोजना)।
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अग्रोहा (हरियाणा): 1.26 करोड़ रुपये।
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द्वारका (गुजरात): 1 करोड़ रुपये।
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एलिफेंटा द्वीप (महाराष्ट्र): 99.17 लाख रुपये।
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भावनगर (गुजरात): 93.34 लाख रुपये।
अन्य प्रमुख सक्रिय स्थल
इन प्रमुख स्थलों के अलावा, देश के अन्य हिस्सों में भी महत्वपूर्ण उत्खनन कार्य जारी हैं, जिनमें शामिल हैं:
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उत्तर प्रदेश: पिपरावा।
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कर्नाटक: ब्रह्मगिरी और कमलापुरा।
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बिहार: बलिराजगढ़।
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ओडिशा: जौगढ़ किला।
पिछले पांच वर्षों की प्रगति
सरकार ने बताया कि पिछले पांच वर्षों (2021-2025) के दौरान, ASI ने कुल 121 पुरातात्विक परियोजनाएं सफलतापूर्वक पूरी की हैं। इन वर्षों में मंजूरी दी गई परियोजनाओं का क्रम इस प्रकार रहा:
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2021-22 में 24 परियोजनाएं।
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2022-23 में 31 परियोजनाएं।
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2023 में 19 परियोजनाएं।
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2024 में 22 परियोजनाएं।
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2025 में 25 परियोजनाएं।
इन वर्षों के दौरान दिल्ली के प्रसिद्ध पुराना किला, राजस्थान के बेनवा और बहाज जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों पर भी खुदाई की गई है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रक्रिया
खुदाई के दौरान मिलने वाली महत्वपूर्ण वस्तुओं—जैसे कि मिट्टी के बर्तन (pottery), प्राचीन सिक्के, मनके, आभूषण, कृषि उपकरण और हड्डियों के अवशेष—को सुरक्षित रखा जाता है। मंत्री के अनुसार, इन पुरावशेषों को वैज्ञानिक जांच और प्रमाणन के लिए भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण (AnSI) और बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में भेजा जाता है ताकि उनके ऐतिहासिक महत्व को समझा जा सके।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पिछले पांच वर्षों में किसी भी पुरातात्विक परियोजना को बंद करने के संबंध में कोई अदालती आदेश प्राप्त नहीं हुआ है, जिससे इन शोध कार्यों की निरंतरता बनी हुई है।




