लखनऊ अलीगंज अग्निकांड: “सामने सिर्फ मौत थी…” 11 सरवाइवर्स की आंखों देखी कहानी
जब थमने लगी थीं सांसें, तब लोहे की रॉड, केबल के तार और हौसले ने बख्श दी नई जिंदगी

लखनऊ। जब जिंदगी और मौत के बीच महज चंद इंच का फासला रह जाए, जब आंखों के सामने सिर्फ घना काला धुआं हो और फेफड़े सांस लेने के लिए तड़प रहे हों… तब इंसान कैसा महसूस करता है? लखनऊ के अलीगंज में हुए भयानक अग्निकांड से सुरक्षित बाहर निकले 11 लोगों के लिए यह कोई काल्पनिक खौफ नहीं, बल्कि एक ऐसी खौफनाक हकीकत थी जिसने उनकी रूह को कंपा कर रख दिया।

दम घोंट देने वाले उस काले धुएं के बीच, जब हर उम्मीद टूट रही थी, तब इन मासूमों के भीतर छिपी ‘जिंदगी जीने की जिद’ ने मौत को शिकस्त दे दी। आइए जानते हैं उन Survivors की जुबानी, जिन्होंने उस काली दोपहर में मौत को बेहद करीब से देखा।
1. “लोहे की रॉड और केबल के तारों ने बख्श दी नई जिंदगी” – शैलेंद्र
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले 24 वर्षीय शैलेंद्र उस मंजर को याद करते हुए आज भी कांप उठते हैं। उन्होंने बताया:
“जब आग लगी और गलियारों में दम घोंट देने वाला काला धुआं भर गया, तो एक पल के लिए मुझे लगा कि आज मेरी जिंदगी का आखिरी दिन है। धुआं इतना गाढ़ा था कि आंखें अंधी हो चुकी थीं और सांसें थम रही थीं। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैं अपने कुछ साथियों के साथ आगे बढ़ता रहा। तभी हमें एक खिड़की दिखाई दी। किस्मत से वहां एक लोहे की रॉड पड़ी थी, जिससे हमने खिड़की का शीशा तोड़ दिया। शीशा टूटते ही ताजी हवा अंदर आई और हमारे दिमाग ने काम करना शुरू किया। बाहर टीवी केबल के तार लटके हुए थे, हमने उन्हें बांधा और एक-एक करके नीचे उतर आए। आग हमसे महज कुछ इंच की दूरी पर धधक रही थी।”
2. “एक बंद बक्से में मची भगदड़ जैसा था वो मंजर” – मोहम्मद आसिफ
32 वर्षीय मोहम्मद आसिफ ने उस रोंगटे खड़े कर देने वाले अनुभव को साझा करते हुए बताया कि वहां का नजारा किसी खौफनाक फिल्म जैसा था।
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अंधेरे का साम्राज्य: जैसे ही चारों तरफ “भागो-भागो, आग लग गई” की चीखें गूंजीं, पल भर में पूरी मंजिल काले धुएं की आगोश में समा गई। लाइटें धुंधली हुईं और फिर पूरी तरह बुझ गईं। मेज, दरवाजे, बाहर निकलने के रास्ते… सब कुछ उस घने काले कोहरे में गायब हो गया।
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बढ़ता हुआ खौफ: आसिफ बताते हैं, “वह एक बंद बक्से के भीतर मची भगदड़ जैसा था। लोग बिना कुछ देखे एक-दूसरे से टकराते हुए भाग रहे थे। मुझे लगा मैं अब कभी बाहर नहीं निकल पाऊंगा। तभी मैंने अपनी एक सहकर्मी को अचानक बेहोश होकर गिरते देखा। एक पल पहले वह खड़ी थी और अगले ही पल गिर गई… लेकिन अंधेरा इतना था कि कोई उसकी मदद के लिए पहुंच ही नहीं सका।”
3. “सीढ़ियां दिख नहीं रही थीं, बस रेलिंग के सहारे बढ़ता गया” – पंकज गोस्वामी
उत्तराखंड के अल्मोड़ा के रहने वाले 24 वर्षीय पंकज गोस्वामी के लिए वो पल ऐसा था जैसे जिंदगी उनके हाथों से फिसल रही हो। उनका गला जल रहा था और आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। पंकज ने बताया:
“मुझे सीढ़ियां दिखाई नहीं दे रही थीं। मैंने बस कसकर रेलिंग को पकड़ा और एक-एक कदम आगे बढ़ाया। डर था कि कहीं मैं किसी गहरी खाई में न गिर जाऊं। लेकिन तभी मुझे खिड़की का वो टूटा हुआ हिस्सा दिखा जहां से शैलेंद्र और बाकी लोग बाहर निकल रहे थे, और मैं भी किसी तरह नीचे आ गया।”
मौत से बदतर था वहां रुकना: पहली मंजिल से लगा दी छलांग
खौफ का आलम यह था कि एक अन्य युवक ने वहां धुएं में घुटकर मरने के बजाय पहली मंजिल की खिड़की से नीचे छलांग लगाना बेहतर समझा। हालांकि, इस वजह से उसकी पीठ में गंभीर चोट आई है, लेकिन उसका कहना है कि “वहां रुकने का सीधा मतलब सिर्फ मौत था।”
एक भावुक संदेश: सलामत हैं वो जांबाज
यह अग्निकांड हमें व्यवस्था की कमियों और दर्द की कई कहानियां दे गया है, लेकिन इन 11 जिंदगियों का बच निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह कहानी गवाह है कि जब इंसान के भीतर जीने का हौसला और अपनों के पास लौटने की तड़प जिंदा हो, तो वह मौत के काले साए को भी चीरकर बाहर आ सकता है। आज ये सभी अस्पताल में अपनी चोटों का इलाज करा रहे हैं, लेकिन उनके चेहरों पर मौत को हराने का वो सुकून साफ देखा जा सकता है।







