Video: यूरोप में जलवायु परिवर्तन का खौफनाक चेहरा: भीषण गर्मी के बीच 1,300 से अधिक लोगों ने गंवाई जान
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी—यह केवल शुरुआत है, 'ओमेगा ब्लॉक' और ग्लोबल वार्मिंग ने स्थिति को बनाया बेकाबू

पेरिस/मैड्रिड: यूरोप इन दिनों अब तक की सबसे भीषण गर्मी की चपेट में है। जून के अंत से शुरू हुई इस ‘हीटवेव’ ने पूरे महाद्वीप में हाहाकार मचा दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, 21 जून से अब तक यूरोप में अत्यधिक तापमान के कारण 1,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

फ्रांस और स्पेन सबसे अधिक प्रभावित
इस गर्मी का सबसे बुरा असर फ्रांस और स्पेन में देखने को मिला है। फ्रांस में अब तक 1,000 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं, जिनमें ज्यादातर बुजुर्ग शामिल हैं। वहीं, स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी आधिकारिक पुष्टि की है कि जून में गर्मी से संबंधित कारणों से 1,029 लोगों की जान गई है। स्पेन के लिए यह जून का महीना 2015 के बाद सबसे घातक साबित हुआ है।
कई देशों में टूटे तापमान के पुराने रिकॉर्ड
गर्मी का प्रकोप केवल पश्चिमी यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूर्वी यूरोप में भी फैल गया है:
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हंगरी: यहाँ का पारा 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया, जिसने 2007 के 41.9 डिग्री सेल्सियस के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।
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स्लोवाकिया: यहाँ तुर्ना नाद बोदवो (Turna nad Bodvou) में 41°C का नया उच्चतम तापमान दर्ज किया गया।
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जर्मनी और चेक गणराज्य: इन देशों में भी तापमान 41 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया, जो अब तक का एक नया रिकॉर्ड है।

‘ओमेगा ब्लॉक’ और जलवायु परिवर्तन का असर
वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार, इस भीषण गर्मी के पीछे ‘ओमेगा ब्लॉक’ (Omega block) नामक मौसमी पैटर्न मुख्य कारण है। इसमें उच्च दबाव का एक बड़ा क्षेत्र दो निम्न दबाव प्रणालियों के बीच फंस जाता है, जिससे गर्मी लंबे समय तक एक ही जगह बनी रहती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन के बिना इस तरह की भीषण गर्मी “लगभग असंभव” थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रोस अदनोम घेब्येयियस ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है, जो वैश्विक औसत से दोगुनी गति से गर्म हो रहा है।
जनजीवन पर बुरा असर
भीषण गर्मी के कारण यूरोप का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है:
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बुनियादी ढांचा: अत्यधिक तापमान से सड़कें पिघल रही हैं और रेल की पटरियां टेढ़ी हो रही हैं।
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ऊर्जा संकट: यूक्रेन जैसे युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में बिजली ग्रिड पर अत्यधिक दबाव बढ़ गया है, जिससे आपातकालीन बिजली कटौती करनी पड़ रही है।
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स्वास्थ्य प्रणाली: अस्पतालों पर मरीजों का दबाव बढ़ गया है। कई देशों में सरकारों ने ‘हीट शेल्टर’ खोले हैं और बुजुर्गों की निगरानी के लिए विशेष कल्याणकारी पहल शुरू की हैं।
यूरोपीय अधिकारी अब आने वाले सप्ताहांत के लिए भी सतर्क हैं, क्योंकि मौसम विभाग ने तापमान में और वृद्धि होने की संभावना जताई है।



