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विकास के नाम पर ‘टपकती छतें’: बनारस, रायपुर और भोपाल में सिस्टम की बदहाली का सच

करोड़ों खर्च कर किए गए पुनरुद्धार की पहली ही बारिश में खुली पोल; कागजों पर चकाचौंध, धरातल पर क्यों बेहाल हैं हमारे रेलवे स्टेशन?

7 जुलाई, विशेष: पिछले कुछ वर्षों में, भारत की तस्वीर बदलने का शोर चारों तरफ है। स्टेशनों पर चमकती लाइटें, वंदे भारत की रफ्तार और एक्सप्रेसवे का जाल—सरकार के दावों की लिस्ट लंबी है। लेकिन, जब हम इस चकाचौंध के पीछे झांकते हैं, तो असलियत का चेहरा बेहद कुरूप नज़र आता है। बनारस से लेकर रायपुर और भोपाल तक, हमारे रेलवे स्टेशन और हाल ही में बनी अधोसंरचनाएं (Infrastructure) इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि हम ‘विकास’ के नाम पर नींव को खोखला कर रहे हैं।

जब ‘पहली बारिश’ ही विकास का इम्तिहान बन जाए

सबसे शर्मनाक पहलू तो यह है कि जिन स्टेशनों का करोड़ों की लागत से पुनरुद्धार (Renovation) किया गया, उनकी पोल पहली ही बारिश में खुल गई। चाहे वह बनारस हो, रायपुर हो या भोपाल—इन तमाम स्टेशनों की छतें पहली बारिश का भी बोझ नहीं झेल सकीं और अंदर पानी टपकने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। यह कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह उन तमाम परियोजनाओं का प्रतीक है, जहां कागजों पर तो अरबों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीन पर ‘मिट्टी और भ्रष्टाचार’ की परतें बिछाई गईं। क्या जनता का पैसा इसलिए था कि उद्घाटन के कुछ ही समय बाद स्टेशन ‘वॉटरफॉल’ में तब्दील हो जाए?

स्टेशनों की बदहाली: सुविधाएं हैं या केवल दिखावा?

बात सिर्फ छत से टपकते पानी की नहीं है। स्टेशनों पर यात्रियों की स्थिति किसी संघर्ष से कम नहीं है:

  • वाराणसी: धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के बावजूद, यहां के स्टेशनों पर व्यवस्थाओं का टोटा है। भीड़ का दबाव और संसाधनों की कमी यात्रियों को परेशान कर रही है।

  • रायपुर और भोपाल: इन स्टेशनों पर आधुनिकीकरण का काम तो चल रहा है, लेकिन यात्रियों को सुविधाएं नदारद हैं। लिफ्ट की सुरक्षा हो, प्लेटफार्मों पर पंखों का अभाव हो या आरओ के नाम पर मिलता गर्म पानी—यह उस ‘विकसित’ रेलवे की तस्वीर है, जहां पैसेंजर ‘सुविधा’ के नाम पर केवल ‘संघर्ष’ खरीद रहे हैं।

सरकार से सीधा सवाल: जवाबदेही किसकी?

विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच आम आदमी ठगा हुआ महसूस कर रहा है। आज सवाल यह नहीं है कि कितनी नई ट्रेनें चलीं, बल्कि सवाल यह है कि:

  1. गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) कहां है? जिन ठेकेदारों और अधिकारियों की निगरानी में ये निर्माण हुए, क्या उन पर कभी कार्रवाई होगी?

  2. मेंटेनेंस की जिम्मेदारी किसकी? स्टेशनों के बुनियादी ढांचे को बदहाल क्यों छोड़ दिया गया है? क्या अमृत भारत स्टेशन योजना केवल दीवारों पर पेंट करने और सेल्फी पॉइंट बनाने तक सीमित है?

  3. करदाताओं के पैसे का हिसाब कौन देगा? जब एक स्टेशन का हिस्सा उद्घाटन के कुछ ही समय बाद ढह जाता है या छत से पानी टपकने लगता है, तो क्या यह सीधे तौर पर जनता के विश्वास के साथ धोखाधड़ी नहीं है?

हम एक ऐसे भारत का सपना देख रहे हैं जो वैश्विक मंच पर अपनी मजबूती दिखाए, लेकिन यह मजबूती नींव की ईंटों से आती है, विज्ञापनों के चमकते पोस्टरों से नहीं। अगर हम इसी गति से परियोजनाओं की गुणवत्ता से समझौता करते रहे, तो आने वाले समय में ये ‘विकास के मॉडल’ ही आपदा का कारण बनेंगे।

समय आ गया है कि सरकार फीता काटने की रस्म से बाहर निकलकर ‘जवाबदेही’ (Accountability) को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाए। जनता को ‘स्मार्ट’ स्टेशनों के वादे नहीं, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ बुनियादी ढांचा चाहिए।

क्या विकास का अर्थ केवल ‘उद्घाटन’ है, या फिर उस निर्माण की उम्र भी कोई मायने रखती है? सरकार को अब इन टपकती छतों के नीचे खड़े होकर जवाब देना होगा।

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