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भारत पर जल संकट का खतरा: 166 प्रमुख जलाशयों का जलस्तर गिरकर 28% पर पहुँचा

मानसून में देरी और कम बारिश के कारण बढ़ी चिंता, कृषि और बिजली उत्पादन पर पड़ेगा बुरा असर

नई दिल्ली: भारत इस समय एक गंभीर जल संकट की स्थिति का सामना कर रहा है। देश में मानसून के देरी से आने और कमजोर पड़ने के कारण प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर चिंताजनक रूप से गिर गया है।

केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission) के ‘जलाशय भंडारण निगरानी प्रणाली’ (Reservoir Storage Monitoring System) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देश भर के 166 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी घटकर उनकी कुल भंडारण क्षमता का केवल 28% रह गया है।

मानसून में देरी का असर

यह गिरावट देश में चल रहे मानसून सत्र के दौरान लगभग 40% की कमी के कारण आई है। हालांकि, जल स्तर अभी भी पिछले 10 वर्षों की इसी अवधि के दौरान दर्ज किए गए औसत भंडारण से थोड़ा अधिक है, लेकिन जल स्तर के घटने की प्रवृत्ति (trend) गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है।

इन क्षेत्रों पर मंडराया खतरा

जलाशय सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, उद्योगों और जलविद्युत उत्पादन के लिए पानी का मुख्य स्रोत होते हैं। यदि मानसून के आगे बढ़ने की गति धीमी रहती है, तो भंडारण स्तर में और अधिक गिरावट आ सकती है, जिससे निम्नलिखित क्षेत्रों पर बुरा असर पड़ने की आशंका है:

  • कृषि: सिंचाई के लिए पानी की कमी।

  • पेयजल: कई राज्यों में पीने के पानी की समस्या।

  • ऊर्जा: जलविद्युत परियोजनाओं (Hydroelectric projects) से बिजली उत्पादन में कमी।

किन प्रमुख परियोजनाओं पर असर?

जिन 166 जलाशयों की निगरानी की जा रही है, उनमें 20 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े हैं। इनमें शामिल हैं:

  • गोविंद सागर (हिमाचल प्रदेश)

  • थीन बांध (पंजाब)

  • राणा प्रताप सागर (राजस्थान)

  • हीराकुंड (ओडिशा)

  • पंचेत हिल (झारखंड)

  • उकाई और सरदार सरोवर (गुजरात)

  • पेनच (महाराष्ट्र)

क्षेत्रीय स्थिति

आंकड़ों के अनुसार, देश भर में स्थिति अलग-अलग है:

  • उत्तर और मध्य भारत: यहाँ के जलाशयों का प्रदर्शन पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर है।

  • पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी भारत: इन क्षेत्रों के जलाशयों में जल स्तर में काफी गिरावट दर्ज की गई है, जो आने वाले समय के लिए चुनौती बन सकता है।

सरकार और जल प्रबंधन एजेंसियां स्थिति पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं, लेकिन मानसून की आगामी प्रगति ही तय करेगी कि यह संकट कितना गहरा होगा।

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