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पहाड़ों पर कचरे का ‘प्रदूषण’: शिमला और कुफरी में बढ़ते संकट पर पर्यटक और विशेषज्ञ चिंतित

पीएम मोदी की Gen Z से अपील के बीच, क्या संभल पाएगा पर्यटन का गढ़?

शिमला: हिमाचल प्रदेश के सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थलों में शुमार शिमला और कुफरी इन दिनों एक गंभीर पर्यावरणीय संकट की चपेट में हैं। हर साल लाखों की तादाद में आने वाले पर्यटकों के कारण यहाँ न केवल भीड़ बढ़ रही है, बल्कि कचरे का एक ऐसा अंबार भी जमा हो रहा है जिसने पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है।

पर्यटन बनाम पर्यावरण: एक कड़वा सच

पर्यटन सीजन के दौरान पहाड़ों की वादियों में प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के खाली पैकेट और अन्य कचरा बिखरा हुआ मिलना अब आम बात हो गई है। हाल ही में ANI की रिपोर्ट में सामने आई तस्वीरों ने यह साफ कर दिया है कि हमारी लापरवाही से ये पहाड़ धीरे-धीरे डंपिंग ग्राउंड (कूड़ेदान) में तब्दील हो रहे हैं।

पीएम मोदी का संदेश: Gen Z से खास अपील

पर्यावरण को बचाने की इस मुहिम में अब देश के युवाओं की भूमिका पर जोर दिया जा रहा है। नोएडा से आए एक पर्यटक ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने खास तौर पर Gen Z (युवा पीढ़ी) से आग्रह किया था कि वे पहाड़ी क्षेत्रों में यात्रा करते समय अपने पास एक बैग रखें। उन्होंने कहा, “हमें अपना कचरा पहाड़ों में नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि उसे वापस अपने साथ ले जाना चाहिए।”

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों की चिंता

  • प्रदीप सांगवान (संस्थापक, Healing Himalayas): जाने-माने पर्यावरणविद प्रदीप सांगवान का मानना है कि यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि एक लंबे समय से नजरअंदाज किया गया मुद्दा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब समय आ गया है जब नीतिगत बदलाव के साथ-साथ जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाए जाएं।

  • राकेश ठाकुर (एडवेंचर टूर ऑपरेटर, कुफरी): राकेश ठाकुर का कहना है कि समस्या सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल की है। उन्होंने कहा, “प्रशासन पर निर्भर रहने के बजाय, पर्यटकों को जागरूक और जिम्मेदार होना होगा।”

पहाड़ों पर कचरे का संकट: क्या ‘देवभूमि’ बन रही है कूड़ेदान?

क्या हैं समाधान के रास्ते?

  1. Responsible Tourism: पर्यटकों को यह समझना होगा कि पहाड़ प्रकृति का उपहार हैं, कचरा फेंकने की जगह नहीं।

  2. सख्त कानून: कचरा फैलाने वालों के खिलाफ प्रशासन को कड़ा रुख अपनाना होगा।

  3. सामूहिक जिम्मेदारी: स्थानीय एनजीओ और प्रशासन के साथ मिलकर सफाई अभियानों को हर सीजन का अभिन्न अंग बनाना होगा।

निष्कर्ष: हिमाचल की सुंदरता को बचाने के लिए अब समय आ गया है कि हम ‘पर्यटक’ होने के साथ-साथ ‘जिम्मेदार नागरिक’ भी बनें। अगली बार जब आप पहाड़ों की यात्रा की योजना बनाएं, तो याद रखें—“अपनी यादें साथ ले जाएं, और अपना कचरा वापस लाएं।”

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