झारखंड के पारंपरिक वाद्ययंत्र ‘मांदर’ को मिला जीआई टैग, मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान
भारत सरकार ने 'मांदर ऑफ झारखंड' को दी कानूनी पहचान; सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के साथ स्थानीय कारीगरों के लिए खुलेंगे वैश्विक अवसर

रांची / चेन्नई, 29 सितंबर 2026: झारखंड की समृद्ध लोक-संस्कृति, आदिवासी जीवन और पारंपरिक नृत्यों की धड़कन माने जाने वाले प्रसिद्ध वाद्ययंत्र ‘मांदर’ को आधिकारिक रूप से जीआई (Geographical Indication) टैग प्रदान किया गया है। भारत सरकार के भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, चेन्नई ने इसे ‘मांदर ऑफ झारखंड’ (Mandar of Jharkhand) के नाम से पंजीकृत कर एक विशेष और कानूनी पहचान दे दी है।
2021 से चल रही थी प्रक्रिया
News On AIR की रिपोर्ट के अनुसार, इस पारंपरिक वाद्ययंत्र को जीआई टैग दिलाने के लिए 24 सितंबर 2021 को आधिकारिक आवेदन दाखिल किया गया था। इसकी अनूठी बनावट, स्थानीय लाल मिट्टी से तैयार किए जाने वाले ढांचे (खोल), निर्माण की पारंपरिक तकनीकों और इससे निकलने वाली विशेष मधुर ध्वनि को मुख्य आधार बनाकर जीआई रजिस्ट्री के समक्ष दावा प्रस्तुत किया गया था।
झारखंड की मिट्टी और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान
मांदर को जीआई टैग मिलने पर ‘मांदर सम्राट’ मानपूरन नायक ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए इसे झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि यह पहचान हमारे पूर्वजों, कारीगरों और झारखंड की मिट्टी के प्रति एक सच्चा सम्मान है।
कारीगरों और बाजार के लिए क्यों खास है यह उपलब्धि?
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वैश्विक पहचान: जीआई टैग मिलने से मांदर की नकल या फर्जी बिक्री पर लगाम लगेगी और इसे राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रामाणिक पहचान मिलेगी।
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कारीगरों को आर्थिक लाभ: राज्य के पारंपरिक कारीगरों को उनके उत्पाद की सही कीमत मिल सकेगी, जिससे इस शिल्प से जुड़े परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
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सांस्कृतिक संरक्षण: सरहुल, करम और अन्य प्रमुख पर्व-त्योहारों में गूंजने वाली मांदर की थाप को अब वैश्विक स्तर पर एक संरक्षित और पहचान-प्राप्त सांस्कृतिक धरोहर माना जाएगा।




