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Quartz बनाम Mechanical: कलाई पर वक्त की जंग और ‘Titan’ बनने की अनकही दास्तान

जानिए दोनों घड़ियों में कौन सी है आपके लिए बेहतर, और कैसे टाटा के एक फैसले ने भारत में शुरू की 'क्वार्ट्ज क्रांति'

डिजिटल डेस्क:  अक्सर हमारे हाथ की कलाई पर बंधी घड़ी सिर्फ वक्त नहीं बताती, बल्कि वह इंजीनियरिंग की एक अद्भुत कलाकृति होती है। घड़ी प्रेमियों और आम उपभोक्ताओं के बीच हमेशा से एक बहस छिड़ी रही है—क्वार्ट्ज (Quartz) और मैकेनिकल (Mechanical) घड़ियों में क्या अंतर है, और दोनों में से बेहतर कौन सी है? हाल ही में अमेज़न प्राइम वीडियो (और अमेज़न MX प्लेयर) पर आई बेहद चर्चित वेब सीरीज़ ‘Made In India: A Titan Story’ ने इस तकनीकी बहस और भारत के घड़ी उद्योग के इतिहास को एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है। आइए जानते हैं इन दोनों तकनीकों का फर्क और भारत की अपनी ‘टाइटैनिक’ क्रांति की कहानी।


Quartz और Mechanical घड़ियों में मुख्य अंतर

इन दोनों घड़ियों के बीच का बुनियादी अंतर इनके चलने के तरीके यानी इनके ‘मूवमेंट’ (Movement) में है:

विशेषता मैकेनिकल घड़ी (Mechanical Watch) क्वार्ट्ज घड़ी (Quartz Watch)
काम करने का तरीका यह पूरी तरह यांत्रिक होती है। इसमें एक मुख्य स्प्रिंग (Mainspring) होती है, जिसे हाथ से चाबी देकर (Manual) या हाथ की हलचल से (Automatic) चार्ज किया जाता है। यह बैटरी से चलती है। बैटरी से मिलने वाला करंट एक छोटे क्वार्ट्ज क्रिस्टल को वाइब्रेट करता है, जिससे सर्किट घड़ी की सुइयों को चलाता है।
सटीकता (Accuracy) गियर और स्प्रिंग की वजह से इनमें प्रति दिन कुछ सेकेंड (+/- 5 से 15 सेकेंड) का अंतर आ सकता है। ये बेहद सटीक होती हैं। इनमें महीने भर में बमुश्किल कुछ सेकेंड का ही फर्क आता है।
सुई की चाल (Tick vs Sweep) इसकी सेकेंड वाली सुई बिना रुके एकदम स्मूथली तैरती हुई (Sweeping Motion) चलती है। इसकी सेकेंड वाली सुई हर सेकेंड पर रुक-रुक कर ‘टिक-टिक’ (Ticking Motion) करती है।
रखरखाव और उम्र इन्हें हर कुछ सालों में सर्विसिंग की जरूरत होती है, लेकिन अगर सही देखभाल की जाए, तो ये पीढ़ियों तक चलती हैं। इनमें हर 2-3 साल में सिर्फ बैटरी बदलनी होती है। इनका जीवनकाल मैकेनिकल जितना लंबा नहीं होता।

कौन सी बेहतर है और क्यों?

इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है; यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके लिए क्या मायने रखता है:

  • सटीकता और कम बजट के लिए ‘Quartz’ बेहतर है: अगर आप एक ऐसी घड़ी चाहते हैं जो हमेशा सही समय दिखाए, जेब पर भारी न पड़े और जिसे रोज-रोज सेट करने का झंझट न हो, तो क्वार्ट्ज आपके लिए बेस्ट है।

  • शौक, कला और विरासत के लिए ‘Mechanical’ बेहतर है: मैकेनिकल घड़ियाँ ‘इंजीनियरिंग का आर्ट’ मानी जाती हैं। घड़ी के पिछले हिस्से से उसकी घूमती हुई गियर और धड़कते हुए बैलेंस व्हील को देखना एक अलग ही अहसास देता है। स्टेटस सिंबल और घड़ी के कद्रदानों (Watch Enthusiasts) के लिए मैकेनिकल हमेशा सर्वोच्च होती है।


प्राइम वीडियो की सीरीज़ और ‘Titan’ बनने का गौरवशाली इतिहास

अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई सीरीज़ Made In India: A Titan Story हमें 1970 और 80 के दशक के उस दौर में ले जाती है, जब भारत में घड़ियों का बाजार विदेशी स्मगलिंग और गिने-चुने ब्रांड्स (जैसे HMT जो मुख्यतः मैकेनिकल घड़ियाँ बनाता था) के भरोसे था।

विनय कामथ की किताब पर आधारित यह सीरीज़ दिखाती है कि कैसे टाटा समूह के एक दूरदर्शी अधिकारी जर्किस देसाई (Xerxes Desai) (जिनका किरदार जिम सरभ ने निभाया है) और जे.आर.डी. टाटा (नसीरुद्दीन शाह) ने भारत को एक वर्ल्ड-क्लास वॉच ब्रांड देने का सपना देखा।

क्वार्ट्ज क्रांति और टाइटन का उदय

जिस दौर में भारत मैकेनिकल घड़ियों का आदी था, जर्किस देसाई ने भांप लिया था कि दुनिया में ‘क्वार्ट्ज क्रांति’ (Quartz Crisis) आ चुकी है। उन्होंने लीक से हटकर भारत में अत्याधुनिक क्वार्ट्ज घड़ियाँ बनाने की ठानी। राह आसान नहीं थी—सरकारी लालफीताशाही, वित्तीय संकट और वैश्विक स्तर पर मिले उपहास के बावजूद, टाटा ने तमिलनाडु औद्योगिक विकास निगम (TIDCO) के साथ मिलकर 1984 में ‘टाइटन’ (Titan) की नींव रखी।

टाइटन ने भारत को न केवल बेहद सटीक और खूबसूरत क्वार्ट्ज घड़ियाँ दीं, बल्कि बाद में दुनिया की सबसे पतली क्वार्ट्ज घड़ी ‘Titan Edge’ बनाकर वैश्विक स्तर पर अपनी तकनीक का लोहा मनवाया।

निष्कर्ष

प्राइम वीडियो की यह सीरीज़ सिर्फ टाइटन ब्रांड के बनने की कहानी नहीं है, बल्कि यह क्वार्ट्ज तकनीक की उस जीत की गाथा है जिसने भारतीयों के समय देखने के अंदाज को बदल दिया। आज भले ही मैकेनिकल घड़ियाँ एक विंटेज और लग्जरी शगल बन चुकी हैं, लेकिन रोज़मर्रा की जिंदगी में क्वार्ट्ज घड़ियों की सटीकता और टाइटन जैसी स्वदेशी कंपनियों के संघर्ष ने ही भारत को कलाई पर गौरव का वक्त पहनना सिखाया।

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